एक दीपक वहां भी जलाएं, जहां आज भी अंधेरा है : दीपावली पर मानवता और संवेदना का संदेश देती लघुकथा

लेखक: जगदीश मालवीय
एक दीपक वहां भी जलाएं, जहां आज भी अंधेरा है
दीपावली की रात थी। पूरा गांव दीयों की रोशनी से जगमगा रहा था। हर घर के आंगन में दीप जल रहे थे, बच्चे पटाखे चला रहे थे और हर चेहरा खुशी से खिला हुआ था।
उसी गांव के किनारे एक टूटी-फूटी झोपड़ी में बूढ़ी मां अकेली बैठी थी। उसके घर में न दीया था, न मिठाई, न कोई अपना। बेटा परदेस में था और पति वर्षों पहले गुजर चुका था। अंधेरी झोपड़ी में बैठी वह गांव की जगमगाहट को दूर से निहार रही थी।
तभी दरवाजे पर आहट हुई। गांव का ही एक छोटा-सा बच्चा शिवांश हाथ में एक दीया, थोड़ी मिठाई और एक नई साड़ी लेकर खड़ा था। उसने कहा, "मां, आज दीपावली है, आपका घर अंधेरे में कैसे रह सकता है। अच्छा नहीं लगता।"
उस मासूम शिवांश ने अपने हाथों से बूढ़ी मां की झोपड़ी में दीया जलाया। उस एक छोटे से दीये से झोपड़ी का अंधेरा छंट गया और बूढ़ी मां की आंखों में बरसों बाद खुशी के आंसू आ गए। उसने शिवांश को गले लगा लिया।
शिवांश ने मुस्कुराकर कहा, "मां, दीपावली तो तभी सार्थक है, जब हम एक दीपक वहां भी जलाएं, जहां आज भी अभाव का अंधेरा है।"
उस रात गांव के सारे दीयों में सबसे ज्यादा रोशनी उस छोटी-सी झोपड़ी के दीये की थी, क्योंकि वह दीया केवल मिट्टी का नहीं, मानवता का दीया था।
लघुकथा से मिलने वाली सीख
दीपावली की असली सार्थकता केवल अपने घर को रोशन करने में नहीं, बल्कि किसी जरूरतमंद के जीवन में खुशियों का उजाला लाने में है। किसी अकेले व्यक्ति को अपनापन देना, किसी गरीब के चेहरे पर मुस्कान लाना और किसी जरूरतमंद की सहायता करना ही त्योहार की सच्ची भावना है।
संदेश: इस दीपावली एक दीपक अपने घर में जलाएं और एक उस घर में भी, जहां आज भी अभाव का अंधेरा है।